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Zenét készítette: hina malik Suno AI

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@hina malik

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Dalszöveg
रात आँगन में उतर आती है धीरे धीरे
रात के भेद बहुत
रंग बहुत
ढंग बहुत

कोई सो जाए... तो
चुपचाप ये सो जाती है
कोई रोता है तो रोती है ये हमदम बन कर
दर्द के क़िस्से सुनाएँ तो ये सुन लेती है
कोई तड़पे जो मोहब्बत में... तो
अपनी बाँहों में ये नरमी से समो लेती है

कोई ख़्वाबों की हसीं दुनिया में रहना चाहे
उसको ये सैर कराती है किसी जन्नत की

कुछ तो ऐसे हैं
जो ख़ुश रहते हैं तन्हाई में
किसी अनचाही रिफ़ाक़त से चुराकर कुछ पल
ख़ामोशी ओढ़ के यादों का मज़ा लेते हैं

जब पड़े ग़म... तो
रोते ही गुज़र जाती है रात
दाग़ कुछ ऐसे... कि
धोते ही गुज़र जाती है रात

आशिकों से कोई पूछे
जो शब-ए-वस्ल की बात
रोएँ-धोएँगे... कि
जल्दी से गुज़र जाती है रात

चाँदनी रात, अमावस हो या बरसात की रात
रात तो रात है
आख़िर को गुज़र जाती है !!
A zene stílusa
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