เนื้อเพลง
[Verse 1]
ग़ज़ल लिख कर मिटानी पड़ रही है
मुहब्बत भी छुपानी पड़ रही है
हर इक शेर में आता है वो ही
फिर स्याही से बहानी पड़ रही है
[Chorus]
मुझे उस से मुहब्बत है
क़सम से
हाँ
क़सम से ये बात
उसको तो न बतानी थी कभी भी
अब तन्हाई से कहनी पड़ रही है
दिन‑रात
मुझे उस से मुहब्बत है
क़सम से
दिल ये बार‑बार दोहराए
पर नाम उसका लब पर आते ही
धड़कन चुप रहना सिखाए
[Verse 2]
वही गलियाँ
वही मौसम
वही रास्ता
उसके क़दमों की आहट भी सुनाई देती है
मैं ख़ुद से भी नज़र चुराता फिरता हूँ अब
उसकी तस्वीर से भी नज़र मिलानी पड़ रही है
[Chorus]
मुझे उस से मुहब्बत है
क़सम से
हाँ
क़सम से ये बात
चेहरे पर मुस्कान
भीतर तूफ़ान
ये सच दिल में छुपाना पड़ रहा है रात‑रात
मुझे उस से मुहब्बत है
क़सम से
जो लिखूँ तो जहाँ जल जाए
सो हर काग़ज़ फाड़ के आज भी
अपना राज़ ही बहाना पड़ रहा है
[Bridge]
वो पूछे तो क्या कहूँ मैं उससे
"बस यूँ ही" कहके टाल दूँ क्या
या एक पल को आँखे उठाकर
सारी उम्र का डर जला दूँ क्या (हाय)
[Chorus]
मुझे उस से मुहब्बत है
क़सम से
हाँ
क़सम से ये बात
अब ख़ामोशी भी थकने लगी है
शायद दिल को ही बतानी पड़ रही है हर बात
मुझे उस से मुहब्बत है
क़सम से
ये सच अब भी अधूरा सा
ग़ज़ल लिख कर मिटानी पड़ रही है
और उसका नाम ही पूरा सा
รูปแบบของดนตรี
Soft ghazal-fusion ballad, intimate male vocals close to the mic, airy harmonium pads and delicately picked acoustic guitar. Tabla groove enters on the second verse, very gentle, with subtle bass underlining key phrases. Choruses bloom with light reverb and a faint backing vocal answering the hook. Overall arc stays tender and restrained, perfect for a late-night confession that never quite reaches the beloved.