मेरे हिस्से का जीना तुम्हें दे रहा हूं/ अब बर्दाश्त नहीं होता जीना/ सोचा था जी लूंगा अपनी मर्जी से लेकिन हो न सका/ आज भी संभाल कर रखा है दिल का एक कोना/ तुम्हारे साथ जीने के लिए/ क्या कहूं कह नहीं पाता/ आंखों से बरसात बरसती रही / चंद्रमा भी आग उगलने लगा/ शीतलता में भी ज्वाला दिखाई देने लगी / कहीं पर भी रोशनी दिखाई नहीं दे रही/ क्या यही जीवन का मोड है/ परिवर्तन जीवन का लक्ष्य नहीं है/ यही सोचते सोचते आंखें भर आई/ फिर सुबह हुई सूरज निकला पंछी निकल पड़े/