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निर्जन रात की निस्तब्धता में, आँखों में उभरती है तुम्हारी परछाई। मुड़कर देखता हूँ खाली सारी राहें, तुम नहीं हो, फिर भी हो दिल के हर कोने में।

हवा पुकारती है तुम्हारा नाम, फिर भी तुम सुनती नहीं वह आह्
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