[Verse 1] तेरी आँखों में जो डूबा तो किनारा ही भूल गया तेरे नाम का सज्दा किया ख़ुदा भी मैं भूल गया
लोग कहते रहे ये इश्क़ बड़ा गुनाह बड़ा सवाल पर तेरी बाहों में आकर हर इल्ज़ाम कबूल गया (हाए)
[Chorus] ये कैसा कुफ़्र-ए-मोहब्बत है तेरे सिवा कुछ याद नहीं दिल के हर सच्चे फ़तवे पर तेरा ही अनलिखा सा हुक्म यहाँ
ये कैसा कुफ़्र-ए-मोहब्बत है जिसमें सब कुछ हार गया तेरे होंठों की एक दुआ पर अपना पूरा जहाँ वार गया (ओ ओ)
[Verse 2] तेरे कंधे पे सिर रखकर मैंने खुद को माफ़ किया टूटी आदत टूटी क़समें सारा हिसाब साफ़ किया
लोग पूछें ये कैसी आरज़ू ये कैसी बेख़ुदी ये हाल मैं मुस्काकर बस इतना कह दूँ तू ही मेरा आख़िरी सवाल
[Chorus] ये कैसा कुफ़्र-ए-मोहब्बत है तेरे सिवा कुछ याद नहीं दिल के हर सच्चे फ़तवे पर तेरा ही अनलिखा सा हुक्म यहाँ
ये कैसा कुफ़्र-ए-मोहब्बत है जिसमें सब कुछ हार गया तेरी पलकों की छाँव में आकर अपना पूरा जहाँ वार गया
النمط من الموسيقى
Lush Hindi romantic ballad over mellow acoustic guitar and deep reverb keys; male vocals intimate in verses, then soaring on the hook. Subtle tabla groove enters in the chorus, with warm string pad swells and soft backing “aaah” harmonies. Dynamic arc grows from whispery confession to cathartic, chest-open climax on the title line, then drops back to a tender, breathy outro.